एक पैगाम था,

धड़कते दिल, रुकी जुबां
लड़खड़ाते कदमो का मामला.
ना जाने तूने क्या कहा,
ना जाने हमने क्या सुना.

क्या मै मिलूंगी जन्नत को,
कहा मिलेगा वह जहा.
वाहा ना कोई दिल जले,
ना दर्द का हो सामना.

खबर नहीं उस शाम की,
सुबह हुआ, गुजर गया.
ना बंदिशें जो रोक ले,
फिर भी ना कोई आराम था.

वोह कौन थे, हम क्या हुए.
ना इल्म था, बस खुमार था.
एक धुप की पतली सी चादर थी,
एक चाय का आधा प्याला था.
थरथराती हुवी उंगलिओ पे,
अब थोड़ी गर्मी थी, थोड़ा सा प्यार था.

हम ढूंडते थे रास्ते,
ना मंज़िलो का काम था.

जो सांस ले तो हस दिए,
एक अजनबी सा आराम था.

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1 Comment

  1. Nice…Keep up the good work !

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